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मनुस्मृति • अध्याय 11 • श्लोक 111
आतुरामभिशस्तां वा चौरव्याघ्रादिभिर्ययैः । पतितां पङ्कलग्नां वा सर्वप्राणैर्विमोचयेत्‌ ।।
रोग या चोर अथवा व्याघ्रादि हिंसक जन्तुओं से भयभीत या गिरी हुई या कीचड़ आदि में फँसी हुई गौ की सब उपायों से रक्षा करे।
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