यो वैश्यः स्याद्दहुपशुर्हीनक्रतुरसोमपः ।
कुटुम्बात्तस्य तदद्रव्यमाहरेद्यज्ञसिद्धये ।।
उसके परिवार से बाकी यज्ञ के पूर्ण होने के लिए (याचना से नहीं देने पर बलात्कार या चोरी से भी) धन लावे। (ऐसे करने वाले क्षत्रिय या विशेषकर ब्राह्मण यज्ञकर्ता को धर्मात्मा राजा उक्तापराध में दण्डित नहीं करे।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
मनुस्मृति के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
मनुस्मृति के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।