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मनुस्मृति • अध्याय 11 • श्लोक 109
दिवानुगच्छेदगास्तास्तु तिष्ठन्नूर्ध्वं रजः पिबेत्‌ । शुश्रूषित्वा नमस्कृत्य रात्रौ वीरासनो वसेत्‌ ।।
दिन में प्रात:काल (चरने के लिए वन आदि को जाती हुई) गायों के पीछे-पीछे जाय और रुककर उनके खुरों के आघात से उड़ती हुई धूलिका पान करे तथा (मच्छर हांकने आदि से) उनकी सेवा तथा नमस्कार करके रात्रि में (उनके रक्षार्थ) वीरासन से बैठे।
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