भृगुजी महर्षियों से कहते हैं कि इन (११।१०७-११८) ब्रतों से महापातकी (११।५३) लोग अपने पापों को नष्ट करें तथा उपपातकी लोग इन (११।५८-६५) अनेक प्रकार के व्रतो से अपने पाप को दूर करे।
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