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मनुस्मृति • अध्याय 11 • श्लोक 105
चान्द्रायणं वा त्रीन्मासानभ्यस्येन्नियतेन्द्रियः । हविष्येण यवाग्वा वा गुरुतल्पापनुत्तये ।।
अथवा--गुरुपत्नी-सम्भोगजन्य पाप की निवृत्ति के लिए जितेन्द्रिय होकर हविष्यान्न से या नीवार आदि की यवागू (लपसी) से तीन मास तक चान्द्रायण ब्रत(१०।२१६-२२०) करे।
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