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मनुस्मृति • अध्याय 11 • श्लोक 104
खट्वाङ्गी चीरवासा वा श्मश्रुलो विजने वने । प्राजापत्यं चरेत्कृच्छुमब्दमेक समाहितः ।।
अथवा खट्वाङ्ग धारण करता हुआ पुराना वस्र पहने एवं केश तथा नख बढ़ाये हुए उस (गुरुपत्नी-सम्भोगकर्त्ता) को निर्जल वन में सावधान होकर एक वर्ष तक प्राजापत्य नामक (११।२ १०) कृच्छु व्रत करना चाहिए।
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