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मनुस्मृति • अध्याय 11 • श्लोक 102
गुरुतल्प्यभिभाष्यैनस्तल्पे स्वप्यादयोमये । सूर्मी ज्वलंतीं वाश्लिष्येन्मृत्युना स विशुध्यति ।।
गुरु (२।१४२) की स्त्री के साथ सम्भोग करनेवाला मनुष्य अपना पाप कहकर तपाये गये लोहे की शय्या पर सोवे तथा जलती हुई लोहमयी स्त्री-प्रतिमा को आलिङ्गन कर मरने से वह पापी शुद्ध (पापहीन) होता है।
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