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मनुस्मृति • अध्याय 11 • श्लोक 101
एतैर्ब्रतैरपोहेत पापं स्तेयकृतं द्विजः । गुरुस्त्रीगमनीयं तु व्रतैरेशिरपानुदेत्‌ ।।
(भृगुजी महर्षियों से कहते हैं कि) द्विज इन (११।९८-१००) व्रतो से (ब्राह्मण के) सुवर्ण को चुराने से उत्पन्न पाप को दूर करे और गुरु-स्त्रीसम्भोग से उत्पन्न पाप को इन (११।१०२-१०५) व्रतो से दूर करे।
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