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मनुस्मृति • अध्याय 11 • श्लोक 100
तपसाऽपनुनुत्सुस्तु सुवर्णस्तेयजं मलम्‌ । चीरवासा द्विजोऽरण्ये चरेद्ब्रह्महणो व्रतम्‌ ।।
(ब्राह्मण के) सुवर्ण को चुराने से उत्पन्न दोष को दूर करने का इच्छुक द्विज (ब्राह्मण आदि तीनों वर्ण) पुराने वस्र को धारण करता हुआ वन में जाकर ब्रह्महत्या के लिए कहे गये (११।७१) प्रायश्चित्त को करे।
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