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मनुस्मृति • अध्याय 1 • श्लोक 86
तपः परं कृतयुगे त्रेतायां ज्ञानमुच्यते । द्वापरे यज्ञमेवाहुर्दानमेकं कलौ युगे ॥
कृतचक्र में 'तपस्या' सर्वोच्च है, त्रेता में 'ज्ञान' इस प्रकार वर्णित है, द्वापर में वे 'यज्ञ' को सर्वोच्च और कलि-चक्र में केवल 'दान' कहते हैं।
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