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मनुस्मृति • अध्याय 1 • श्लोक 8
सोऽभिध्याय शरीरात् स्वात् सिसृक्षुर्विविधाः प्रजाः । अप एव ससर्जादौ तासु वीर्यमवासृजत् ॥
उस स्वयम्भू परमात्मा ने, अपने ही स्वरूप से विविध प्रजाओं की सृष्टि करने की इच्छा करके, सर्वप्रथम जल की सृष्टि की और उसमें अपना बीज (सृष्टि-शक्ति, वीर्य) स्थापित किया।
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