उस स्वयम्भू परमात्मा ने, अपने ही स्वरूप से विविध प्रजाओं की सृष्टि करने की इच्छा करके, सर्वप्रथम जल की सृष्टि की और उसमें अपना बीज(सृष्टि-शक्ति, वीर्य) स्थापित किया।
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