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मनुस्मृति • अध्याय 1 • श्लोक 69
चत्वार्याहुः सहस्राणि वर्षाणां तत् कृतं युगम् । तस्य तावत्शती सन्ध्या सन्ध्यांशश्च तथाविधः ॥
वे कहते हैं कि चार हज़ार 'वर्ष' वही हैं जो 'कृत-युग' है। उतने ही सौ वर्ष प्रभात से बनते हैं और उतनी ही मात्रा में संध्या होती है।
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