निमेषा दश चाष्टौ च काष्ठा त्रिंशत् तु ताः कला ।
त्रिंशत् कला मुहूर्तः स्यादहोरात्रं तु तावतः ॥
अठारह निमेष (आंख की झिलमिलाहट, एक काष्ठ हैं), तीस काष्ठ एक कला, तीस कला एक मुहूर्त, और इतने ही (मुहूर्त) एक दिन और रात।
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