एवं स जाग्रत्स्वप्नाभ्यामिदं सर्वं चराचरम् ।
सञ्जीवयति चाजस्रं प्रमापयति चाव्ययः ॥
इस प्रकार अविनाशी जाग्रत और सुषुप्ति द्वारा निरन्तर इस चर और अचल को प्रिय बना देता है और नष्ट कर देता है।
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