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मनुस्मृति • अध्याय 1 • श्लोक 5
आसीदिदं तमोभूतमप्रज्ञातमलक्षणम् । अप्रतर्क्यमविज्ञेयं प्रसुप्तमिव सर्वतः ॥
यह सम्पूर्ण जगत् प्रारम्भ में अन्धकारमय था, अप्रकट, अलक्षण (जिसका कोई विशिष्ट लक्षण ज्ञात न हो), तर्क से परे और ज्ञान द्वारा अविज्ञेय था। वह मानो चारों ओर से गहन निद्रा में निमग्न (प्रसुप्त) प्रतीत होता था।
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