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मनुस्मृति • अध्याय 1 • श्लोक 49
तमसा बहुरूपेण वेष्टिताः कर्महेतुना । अन्तस्सञ्ज्ञा भवन्त्येते सुखदुःखसमन्विताः ॥
ये सब (वनस्पति प्राणी) नाना प्रकार के 'अंधकार' (जड़त्व) से आच्छादित हैं, उन्हीं के कर्मों का परिणाम है और अन्तःचेतना युक्त सुख-दुःख से प्रभावित होते हैं।
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