यथर्तुलिङ्गान्यर्तवः स्वयमेवर्तुपर्यये ।
स्वानि स्वान्यभिपद्यन्ते तथा कर्माणि देहिनः ॥
जिस प्रकार ऋतुओं की बारी आने पर प्रत्येक ऋतु अपने आप में अपनी मौसमी विशेषताओं को प्राप्त कर लेती है, उसी प्रकार जीव भी अपनी-अपनी क्रिया-पद्धति अपना लेते हैं।
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