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मनुस्मृति • अध्याय 1 • श्लोक 3
त्वमेको ह्यस्य सर्वस्य विधानस्य स्वयम्भुवः । अचिन्त्यस्याप्रमेयस्य कार्यतत्त्वार्थवित् प्रभो ॥
हे प्रभो! आप ही स्वयम्भू (स्वतः प्रकट हुए) इस सम्पूर्ण अचिन्त्य और अप्रमेय विधान के एकमात्र तत्त्वज्ञ हैं। अतः आप ही इस समस्त व्यवस्था के कार्य, तत्त्व और वास्तविक अर्थ को भली-भाँति जानते हैं।
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