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मनुस्मृति • अध्याय 1 • श्लोक 27
अण्व्यो मात्रा विनाशिन्यो दशार्धानां तु याः स्मृताः । ताभिः सार्धमिदं सर्वं सम्भवत्यनुपूर्वशः ॥
जो अत्यन्त सूक्ष्म, विनाशी मात्राएँ (तन्मात्राएँ) दश भागों के अर्धांश के समान सूक्ष्म मानी गई हैं, उन्हीं के साथ क्रमशः यह समस्त जगत् उत्पन्न होता है। अर्थात्, इन अति सूक्ष्म तत्त्वों से ही सम्पूर्ण सृष्टि का विकास क्रमशः होता है
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