आद्याद्यस्य गुणं त्वेषामवाप्नोति परः परः ।
यो यो यावतिथश्चैषां स स तावद् गुणः स्मृतः ॥
इन तत्त्वों में प्रत्येक उत्तरवर्ती तत्त्व, अपने से पूर्ववर्ती तत्त्व के गुण को ग्रहण करता है। इस प्रकार, इनमें से जो तत्त्व जितने पूर्ववर्ती तत्त्वों के गुणों को धारण करता है, वह उतने ही गुणों से युक्त माना जाता है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
मनुस्मृति के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
मनुस्मृति के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।