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मनुस्मृति • अध्याय 1 • श्लोक 20
आद्याद्यस्य गुणं त्वेषामवाप्नोति परः परः । यो यो यावतिथश्चैषां स स तावद् गुणः स्मृतः ॥
इन तत्त्वों में प्रत्येक उत्तरवर्ती तत्त्व, अपने से पूर्ववर्ती तत्त्व के गुण को ग्रहण करता है। इस प्रकार, इनमें से जो तत्त्व जितने पूर्ववर्ती तत्त्वों के गुणों को धारण करता है, वह उतने ही गुणों से युक्त माना जाता है।
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