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मनुस्मृति • अध्याय 1 • श्लोक 14
उद्बबर्हात्मनश्चैव मनः सदसदात्मकम् । मनसश्चाप्यहङ्कारमभिमन्तारमीश्वरम् ॥
उन्होंने अपने ही स्वरूप से मन की उत्पत्ति की, जो सत् और असत् दोनों का ग्रहण करने वाला है। और मन से अहंकार की उत्पत्ति की, जो 'मैं' भाव का अभिमान करने वाला तथा अधिष्ठाता है।
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