आचारः परमो धर्मः श्रुत्योक्तः स्मार्त एव च ।
तस्मादस्मिन् सदा युक्तो नित्यं स्यादात्मवान् द्विजः ॥
नैतिकता [सही व्यवहार] सर्वोच्च धर्म है। वह जो श्रुति में निर्धारित है और स्मृति में रखा गया है। इसलिए द्विज को अपनी आत्मा के कल्याण की कामना करते हुए सदैव सही व्यवहार पर दृढ़ रहना चाहिए।
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