नानात्मभेदहीनोऽस्मि हाखण्डानन्दविग्रहः ।
नाहमस्मि न चान्योऽस्मि देहादिरहितोऽस्म्यहम् ॥
विविधता से रहित तथा अखण्ड आनन्द स्वरूप हूँ। न मैं (अहं रूप) हूँ और अन्य भी नहीं हूँ। मैं शरीरादि से रहित हूँ।
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