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मैत्रेय • अध्याय 3 • श्लोक 5
भावाभावविहीनोऽस्मि भासाहीनो ऽस्मि भास्म्यहम्। शून्याशून्यप्रभावोऽस्मि शोभनाशोभनोऽस्म्यहम् ॥
भाव-अभाव अर्थात् उत्पत्ति और विनाश से परे हूँ। भासा (प्रकाश) से अलग हूँ, किन्तु प्रकाश भी मैं ही हूँ। मैं शून्य और अशून्य रूप हूँ तथा मैं ही सुन्दर और असुन्दर भी हूँ।
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