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मैत्रेय • अध्याय 3 • श्लोक 4
मानावमानहीनोऽस्मि निर्गुणोऽस्मि शिवोऽस्म्यहम्। द्वैताद्वैतविहीनो ऽस्मि द्वन्द्वहीनो ऽस्मि सोऽस्म्यहम् ॥
मैं मान एवं अपमान से रहित हूँ, निर्गुण (गुणरहित) हूँ, मैं ही शिव हूँ, द्वैत एवं अद्वैत के भाव से रहित हूँ, सुख तथा दुःख आदि द्वन्द्वों से रहित हूँ तथा वह (ब्रह्म) मैं ही हूँ।
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