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मैत्रेय • अध्याय 3 • श्लोक 23
सत्यासत्यादिहीनो ऽस्मि सन्मात्रान्नास्म्यहं सदा। गन्तव्यदेशहीनो ऽस्मि गमनादिविवर्जितः ॥
(मैं) सत्य-असत्य से रहित हूँ, केवल मैं ही सत्य स्वरूप से (भिन्न) सभी कालों में नहीं हूँ। मैं गमनागमन से रहित हूँ अर्थात् मुझे कहीं जाना अथवा न जाना नहीं है एवं मेरा गन्तव्य (जाने का स्थान) भी नहीं है।
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