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मैत्रेय • अध्याय 3 • श्लोक 14
न जगत्सर्वद्रष्टास्मि नेत्रादिरहितोऽस्म्यहम्। प्रवृद्धोऽस्मि प्रबुद्धोस्मि प्रसन्नोऽस्मि हरोऽस्म्यहम् ।।
मैं इस संसार का सर्वद्रष्टा नहीं हूँ। मैं आँख आदि समस्त इन्द्रियों से रहित हूँ। मैं ही वृद्धि को प्राप्त करता हुआ, ज्ञानवान्, प्रसन एवं हर (पापों को हरने वाला) हूँ।
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