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मैत्रेय • अध्याय 2 • श्लोक 5
धातुबद्धं महारोगं पापमन्दिरमध्रुवम् । विकाराकारविस्तीर्ण स्पृष्ट्वा स्त्रानं विधीयते ॥
सात धातुओं में निर्मित, महारोग से युक्त, पाप के घर की भाँति, सतत चलायमान (अस्थिर), विकारों से भरे हुए इस शरीर को स्पर्श करने के उपरान्त स्नान अवश्य करना चाहिए।
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