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मैत्रेय • अध्याय 2 • श्लोक 3
ब्रह्यामृतं पिबेद्वैक्षमाचरेद्देहरक्षणे। वसेदेकान्तिको भूत्वा चैकान्ते द्वैतवर्जिते । इत्येवमाचरेद्धीमान्स एवं मुक्तिमाप्नुयात् ॥
ब्रह्मरूपी अमृत का पान करना, शरीर रक्षा के उद्देश्य से ही भिक्षा माँगना, स्वयं अकेला रहकर एकान्त में निवास करना, इस प्रकार से जीवनयापन करता हुआ ज्ञानवान् मनुष्य मुक्ति को प्राप्त करता है।
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