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मैत्रेय • अध्याय 2 • श्लोक 29
द्रष्टदर्शनदृश्यानि त्यक्त्वा वासनया सह। दर्शनप्रथमाभासमात्मानं केवलं भज ॥
द्रष्टा, दृश्य एवं दर्शन को वासना के साथ ही त्याग करके, जिसमें से दर्शन का सर्वप्रथम आभास होता है, उस आत्मा का ही तुम भजन करो।
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