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मैत्रेय • अध्याय 2 • श्लोक 28
मा भव ग्राह्यभावात्मा ग्राहकात्मा च मा भव। भावनामखिलां त्यक्त्वा यच्छिष्टं तन्मयो भव ॥
आप ग्रहण करने वाले न बनें। इसी तरह से ग्रहण करने योग्य विषयरूप भी न बनें। इस प्रकार की सभी कल्पनाओं का त्याग करके शेष जो कुछ भी रहे, उसी में तन्मय रहें।
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