न त्यजेच्चेद्यतिर्मुक्तो यो माधूकरमान्तरम्।
वैराग्यजनकं श्रद्धाकलत्रं ज्ञाननन्दनम् ॥
जो संन्यासी मुक्त हो चुका है, वह वैराग्य रूपी पिता को, श्रद्धा रूपी पत्नी को और ज्ञान रूपी पुत्र को न छोड़ते हुए अन्तःकरण में स्थित अद्वैतभावना का आनन्दमय रूप में चिन्तन करे।
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