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मैत्रेय • अध्याय 2 • श्लोक 21
उत्तमा तत्त्वचिन्तैव मध्यमं शास्त्रचिन्तनम्। अधमा मन्त्रचिन्ता च तीर्थभ्रान्त्यधमाधमा ॥
तत्त्व का चिन्तन ही उत्तम् (श्रेष्ठ) है, शास्त्र का चिन्तन मध्यम है, मन्त्रों का चिन्तन (साधना) अधम है और तीर्थों में भ्रमण करना अधम से भी अधम है।
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