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मैत्रेय • अध्याय 2 • श्लोक 17
कर्मत्यागान्त्र संन्यासो न प्रैषोच्चारणेन तु। संधौ जीवात्मनौरैक्यं संन्यासः परिकीर्तितः ॥
कर्मों को छोड़ देना ही संन्यास नहीं है। इसी प्रकार 'मैं संन्यासी हूँ' ऐसा कह देने से भी कोई सन्यासी नहीं हो सकता। समाधि अवस्था में जीव-परमात्मा की एकता का भान होना ही संन्यास कहा जाता है।
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