शब्दस्पर्शादयो येऽर्था अनर्था इव ते स्थिताः। येषां सक्तस्तु भूतात्मा न स्मरेच्च परं पदम् ॥
शब्द, स्पर्शादि विषय अनर्थ उत्पन्न करने वाले हैं तथा उसमें आसक्त हुए जीवात्मा को परम (श्रेष्ठ) पद का स्वरूप स्मृति में नहीं आता।
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