अथ भगवाञ्छाकायन्यः सुप्रीतोऽब्रवीद्राजानं महाराज बृहद्रथेक्ष्वाकुवंशध्वजशीर्षात्मज्ञः
कृतकृत्यस्त्वं मरुन्नाम्नो विश्रुतोऽसीत्ययं खल्वात्मा ते कतमो भगवन्वर्ण्य इति तं होवाच ॥
ऐ कहे जाने पर भगवान् शाकायन्य मुनि ने अति प्रसन्न होकर राजा से कहा 'हे महाराज बृहद्रथ! तुम इक्ष्वाकु वंशीय श्रेष्ठ पुरुष हो, आत्मज्ञ हो, कृतकृत्य हो, मरुत् नाम से प्रख्यात हो, यही तुम्हारी आत्मा है।' तदनन्तर राजा बृहद्रथ ने कहा - 'हे भगवन्! आत्मा (का स्वरूप) क्या है? इस आत्मतत्त्व का वर्णन करने की कृपा करें? यह सुनकर मुनि ने कहा-
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