वर्ण एवं आश्रम के धर्म तथा वैसे ही अंग अवयवों से युक्त यह शरीर ये सभी आदि अन्त वाले होने के कारण अत्यन्त कष्टप्रद ही हैं। अतः पुत्र आदि के शरीरों पर मोह न रखते हुए परमानन्द रूप अनन्त में प्रतिष्ठित रहना चाहिए।
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