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मैत्रेय • अध्याय 1 • श्लोक 17
वर्णाश्रमाचारयुता विमूढाः कर्मानुसारेण फलं लभन्ते। वर्णादिधर्म हि परित्यजन्तः स्वानन्दतृप्ताः पुरुषा भवन्ति ॥
वर्ण एवं आश्रम धर्म का पालन करने वाले अज्ञानी जन ही अपने कर्मों का फल भोगते हैं; लेकिन वर्ण आदि के धर्मों को त्यागकर आत्मा में ही स्थिर रहने वाले मनुष्य अन्तः के आनन्द से हो पूर्ण सन्तुष्ट रहते हैं।
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