वास्तव में यही आत्माईशान है, यही शम्भु है, यही भव है, यही रुद्र है, यही प्रजापति है, यही विश्वस्रष्टा और हिरण्यगर्भ है।
यही सत्य है, यही प्राण है, यही हंस है, यही शास्ता है, यही विष्णु, नारायण, अर्क, सविता, धाता, सम्राट्, इन्द्र और इन्दु है।
जो यह सूर्यरूप से तप रहा है, जो अग्नि से आवृत है, जो सहस्रनेत्र स्वरूप है, जो हिरण्यमय और आनन्दस्वरूप है — वास्तव में उसी का ज्ञान प्राप्त करना चाहिए, उसी की खोज करनी चाहिए।
इसलिए साधक को समस्त प्राणियों को अभय प्रदान करके, अरण्य में जाकर, इन्द्रियों के विषयों को बाहर छोड़कर, अपने ही शरीर में स्थित उस परमात्मा का साक्षात्कार करना चाहिए।
उसी के विषय में कहा गया है —
उस विश्वरूप, हरितवर्ण, सर्वज्ञ, परम आश्रय, एकमात्र ज्योतिर्मय और स्वयं प्रकाशमान तत्त्व का ध्यान करो।
वह सहस्र किरणों वाला, अनेकों रूपों में प्रकट होने वाला, समस्त प्राणियों का प्राणस्वरूप सूर्य है, जो सबके जीवन का उदय करता है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
मैत्रायण्य के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
मैत्रायण्य के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।