तत्सवितुर्वरेण्यमित्यसौ वा आदित्यः सविता स वा एवं प्रवरणाय आत्मकामेनेत्या-हुर्ब्रह्मवादिनोऽथ भर्गो देवस्य धीमहीति सविता वै तेऽवस्थिता यो ऽस्य भर्गः कं संचिन्तयामीत्याहुर्ब्रह्मवादिनोऽथ धियो यो नः प्रचोदयादिति बुद्धयो वै धियस्ता योऽस्माकं प्रचोदयादित्याहुर्ब्रह्मवादिनोऽथ भर्ग इति यो ह वा अस्मिन्नादित्ये निहितस्तारकेऽक्षिणि वैष भर्गाख्यो भाभिर्गतिरस्य हीति भर्गो भर्जति वैष भर्ग इति रुद्रो ब्रह्मवादिनोऽथ भ इति भासयतीमाँल्लोकान् र इति रञ्जयतीमानि भूतानि ग इति गच्छन्त्यस्मिन्नागच्छन्त्य-स्मादिमाः प्रजास्तस्माद्भरगत्वाद्भर्गः। शश्वत्सूयमानत्वात्सूर्यः सवनात्सविताऽऽदाना-दादित्यः पवनात्पावमानोऽथायनादादित्य इत्येवं ह्याह खल्वात्मनात्मामृताख्यशचेता मन्ता गन्ता स्रष्टाऽऽनन्दयिता कर्ता वक्ता रसयिता घ्राता स्पर्शयिता च विभुर्विग्रहे सन्निविष्ट इत्येवं ह्याहाथ यत्र दैतीभूतं विज्ञानं तत्र हि शृणोति पश्यति जिघ्रति रसयते चैव स्पर्शयति सर्वमात्मा जानीतेति यत्राद्वैतीभूतं विज्ञानं कार्यकारणनिर्मुक्तं निर्वचनमनौपम्यं निरुपाख्यं किं तदङ्ग वाच्यम्॥
"तत् सवितुर्वरेण्यम्" — यहाँ सविता से अभिप्राय आदित्य है। ब्रह्मवादी कहते हैं कि साधक को आत्मप्राप्ति की कामना से उस श्रेष्ठ सविता का वरण करना चाहिए।
"भर्गो देवस्य धीमहि" — ब्रह्मवादी पूछते हैं, "हम उस सविता के किस स्वरूप का ध्यान करें?" इसका उत्तर है कि उसके भर्ग(तेजोमय, पाप-नाशक स्वरूप) का ध्यान करना चाहिए।
"धियो यो नः प्रचोदयात्" — यहाँ धियः का अर्थ बुद्धियाँ हैं। अतः प्रार्थना की जाती है कि वह दिव्य तेज हमारी बुद्धियों को प्रेरित और प्रकाशित करे।
यह भर्ग वास्तव में उस आदित्य में स्थित है, और सूक्ष्म रूप से नेत्र की तारका में भी विद्यमान है। उसे भर्ग इसलिए कहा जाता है क्योंकि वह भर्जन(दोषों का दहन) करता है। इसी कारण ब्रह्मवादी उसे रुद्र भी कहते हैं।
भर्ग शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार कही गई है —
भ — क्योंकि वह इन लोकों को प्रकाशित करता है।
र — क्योंकि वह समस्त प्राणियों को रञ्जित (पोषित एवं संचालित) करता है।
ग — क्योंकि सभी प्राणी उसी में प्रवेश करते हैं और उसी से पुनः प्रकट होते हैं।
इस प्रकार वह भर्ग कहलाता है।
वह निरन्तर प्रकाशित होने के कारण सूर्य है; उत्पन्न करने के कारण सविता है; ग्रहण करने के कारण आदित्य है; शुद्ध करने के कारण पावमान है; और गति देने के कारण भी आदित्य कहलाता है।
इसी प्रकार कहा गया है कि वही आत्मा वास्तव में अमृतस्वरूप, चेतन, मननकर्ता, गमनकर्ता, सृष्टिकर्ता, आनन्ददाता, कर्ता, वक्ता, रस का अनुभव करने वाला, गन्ध ग्रहण करने वाला, स्पर्श का अनुभव करने वाला और सर्वव्यापी होकर शरीर में स्थित है।
जब विज्ञान(चेतना) द्वैतभाव से युक्त होता है, तभी मनुष्य सुनता है, देखता है, सूँघता है, स्वाद लेता है, स्पर्श करता है और समस्त विषयों का ज्ञान प्राप्त करता है।
किन्तु जब वही विज्ञानअद्वैतस्वरूप हो जाता है, तब वह कार्य और कारण से परे, वर्णनातीत, उपमारहित और अकथनीय हो जाता है।
उस अवस्था का वर्णन कैसे किया जा सकता है?
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