प्रारम्भ में यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त और अव्यक्त अवस्था में था। वही सत्यस्वरूप प्रजापति थे, जिन्होंने तप किया।
तत्पश्चात् उन्होंने "भूः, भुवः, स्वः" इन व्याहृतियों का उच्चारण किया।
ये व्याहृतियाँ ही प्रजापति का स्थूल और विश्वरूप शरीर हैं।
इनमें —
स्वः उनका शीर्ष है,
भुवः उनकी नाभि है,
और भूः उनके चरण हैं।
आदित्य उनके नेत्र हैं, क्योंकि यह महान् पुरुष अपनी दृष्टि के द्वारा ही समस्त माप और व्यवस्था का संचालन करता है।
वास्तव में नेत्र ही सत्य का प्रतीक है, क्योंकि मनुष्य अपने नेत्रों से देखकर ही विविध विषयों के विषय में निश्चयपूर्वक कथन करता है।
इसलिए भूः, भुवः, स्वः के रूप में इस प्रजापति की उपासना करनी चाहिए।
यह प्रजापति ही अन्नस्वरूप, विश्वात्मा और समस्त जगत् में विचरण करने वाला है; इस प्रकार उसकी उपासना करनी चाहिए।
इसी कारण कहा गया है —
यह प्रजापति ही समस्त विश्व का धारण-पोषण करने वाला है।
इस सम्पूर्ण जगत् का प्रत्येक पदार्थ उसी में अन्तर्निहित है, और वह स्वयं भी सम्पूर्ण विश्व में अन्तर्निहित है।
अतः इसी रूप में उसकी उपासना करनी चाहिए।
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