अन्यत्र भी कहा गया है कि —
यह ॐकार ही उसकी तनु(प्रकट अभिव्यक्ति) है, जो विविध रूपों में व्यक्त होती है।
यह स्त्री, पुरुष और नपुंसक — इन सभी लिंगों के रूप में विद्यमान है।
यह अग्नि, वायु और आदित्य के रूप में प्रकाशमान है।
यह रुद्र और विष्णु के रूप में समस्त का अधिपति है।
यह गार्हपत्य, दक्षिणाग्नि और आहवनीय अग्नि के रूप में यज्ञ का आधार है।
यह ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद के रूप में ज्ञानस्वरूप है।
यह भूः, भुवः और स्वः के रूप में लोकस्वरूप है।
यह भूत, भविष्य और वर्तमान के रूप में कालस्वरूप है।
यह प्राण, अग्नि और सूर्य के रूप में तेजस्वरूप है।
यह अन्न, जल और चन्द्रमा के रूप में पोषणस्वरूप है।
यह बुद्धि, मन और अहंकार के रूप में चेतनास्वरूप है।
और यह प्राण, अपान तथा व्यान के रूप में प्राणशक्ति का स्वरूप है।
इस प्रकार जो साधक सब कुछ त्यागकर अपने को इस प्रणव में समर्पित कर देता है, वह उसी में प्रतिष्ठित हो जाता है।
इसी कारण कहा गया है —
हे सत्यकाम! यह ॐकाररूप अक्षर ही पर और अपर — दोनों प्रकार के ब्रह्म का स्वरूप है।
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