अथ य एषोऽन्तरे हृत्पुष्कर एवाश्रितोऽन्नमत्ति स एषोऽग्निर्दिवि श्रितः सौरः काला-ख्योऽदृश्य:सर्वभूतान्नमत्ति कः पुष्करः किमयं वेद वा व तत्पुष्करं योऽयमाकाशो-ऽस्येमाश्चतस्रो दिशश्चतस्र उपदिशः संस्था अयमवगग्निः परत एतौ प्राणादित्यावेता-वुपासीतोमित्यक्षरेण व्याहृतिभिःसावित्र्या चेति॥
और जो यह हृदयकमल में स्थित होकर अन्न का अनुभव करता है, वही वास्तव में दिवि स्थित सौर अग्नि है।
वह कालस्वरूप, अदृश्य और समस्त प्राणियों के अन्न का उपभोक्ता है।
अब प्रश्न होता है — यह पुष्कर(हृदयकमल अथवा आकाशरूप आधार) क्या है?
वास्तव में यह आकाश ही वह पुष्कर है।
इसकी चार दिशाएँ और चार उपदिशाएँ हैं, और इनके मध्य में यह अग्नि स्थित है।
इसके परे ये दोनों — प्राण और आदित्य — स्थित हैं।
अतः साधक को इन दोनों की ॐ इस अक्षर, व्याहृतियों तथा सावित्री मन्त्र के द्वारा उपासना करनी चाहिए।
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