मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
मैत्रायण्य • अध्याय 4 • श्लोक 8
समासक्तं यदा चित्तं जन्तोर्विषयगोचरे। यद्येवं ब्रह्मणि स्यात्तत्को न मुच्येत बन्धनात्॥
जब किसी जीव का चित्त विषयों में इस प्रकार गहराई से आसक्त हो सकता है, तो यदि वही चित्त इसी प्रकार ब्रह्म में स्थित हो जाए, तब ऐसा कौन है जो बन्धन से मुक्त न हो जाए?
पूरा ग्रंथ पढ़ें
मैत्रायण्य के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

मैत्रायण्य के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें