चित्तमेव हि संसारस्तत्प्रयत्नेन शोधयेत्।
यच्चित्तस्तन्मयो भवति गुह्यमेतत्सनातनम्॥
चित्त ही वास्तव में संसार है; इसलिए मनुष्य को प्रयत्नपूर्वक चित्त की शुद्धि करनी चाहिए।
क्योंकि मनुष्य का चित्त जैसा होता है, वह स्वयं भी वैसा ही बन जाता है।
यह एक सनातन और गूढ़ रहस्य है।
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