अपने मूल स्वरूप में शांत हो चुके और सत्य की ओर प्रवृत्त मन के लिए, इन्द्रियों के विषय कोई वास्तविक सत्ता नहीं रखते।
किन्तु जो मोहग्रस्त है, उसके लिए वे असत्य विषय ही कर्मों के वश होकर सत्यवत् प्रतीत होते हैं।
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