अन्यत्र भी कहा गया है कि —
यह भूतात्मा अपने पूर्वकृत कर्मों के कारण, मानो प्रबल वेग वाली महानदी के प्रवाह में बह रहा हो; और उसके कर्मों का परिणाम समुद्र की मर्यादा के समान अत्यन्त दुर्निवार्य होता है।
मृत्यु का आगमन भी उसके लिए अपरिहार्य है।
वह शुभ और अशुभ कर्मों के फलों से बने पाशों में बँधे हुए पशु के समान बँधा हुआ है।
वह बन्धन में पड़े व्यक्ति की भाँति अस्वतन्त्र है, और यम के अधिकारक्षेत्र में स्थित प्राणी की भाँति अनेक प्रकार के भयों से घिरा हुआ रहता है।
वह मानो मदिरा से उन्मत्त व्यक्ति के समान मोह में पड़ा हुआ है; पाप से ग्रस्त व्यक्ति की तरह भटकता रहता है; और महासर्प के दंश से पीड़ित व्यक्ति के समान विपत्तियों से आक्रान्त रहता है।
वह घोर अन्धकार की भाँति राग से अन्धा हो जाता है; इन्द्रजाल की भाँति माया से मोहित रहता है; स्वप्न की भाँति मिथ्या अनुभवों में उलझा रहता है।
वह केले के तने के समान साररहित है, नट की भाँति क्षण-क्षण में वेश बदलता रहता है, और चित्रित भित्ति की भाँति मिथ्या रूप से मनोहर प्रतीत होता है।
इसी कारण कहा गया है —
शब्द, स्पर्श आदि जो विषय हैं, वे वास्तव में अनर्थरूप ही हैं। जो भूतात्मा उनमें आसक्त हो जाता है, वह कभी भी परम पद का स्मरण नहीं कर पाता।
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