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मैत्रायण्य • अध्याय 4 • श्लोक 18
अचिन्त्यायाप्रमेयाय अनादिनिधनाय चेति॥
उस परमात्मा को नमस्कार है, जो अचिन्त्य (मन और बुद्धि की पहुँच से परे), अप्रमेय (किसी प्रमाण से पूर्णतः मापा या जाना न जा सकने वाला), तथा अनादि और अनन्त (जिसका न आदि है और न अन्त) है।
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