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मैत्रायण्य • अध्याय 4 • श्लोक 17
विश्वेश्वर नमस्तुभ्यं विश्वात्मा विश्वकर्मकृत्। विश्वभुग्विश्वमायस्त्वं विश्वक्रीडारतिः प्रभुः।।
हे विश्वेश्वर! आपको नमस्कार है। आप ही विश्वात्मा हैं, समस्त जगत् के कर्ता हैं; आप ही विश्व का पालन और भोग करने वाले हैं। आप ही विश्वमाया के अधिष्ठाता हैं, और आप ही इस समस्त सृष्टि-लीला में रमण करने वाले प्रभु हैं।
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