अपामपोऽग्निरग्नौ वा व्योम्नि व्योम न लक्षयेत्।
एवमन्तर्गतं चित्तं पुरुषः प्रतिमुच्यते॥
जिस प्रकार जल में मिला हुआ जल, अग्नि में मिली हुई अग्नि, अथवा आकाश में स्थित आकाश पृथक् रूप से दिखाई नहीं देता,
उसी प्रकार जब चित्त पूर्णतः अन्तर्मुख होकर आत्मा में लीन हो जाता है, तब पुरुष(जीव) समस्त बन्धनों से मुक्त हो जाता है।
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